बहुमत न मिलने पर भाजपा के पास विकल्प

बहुमत न मिलने पर भाजपा के पास विकल्प
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लोकसभा चुनाव के 7 में से 5 चरण समाप्त हो चुके हैं। 23 मई को पता चल जाएगा कि केंद्र में किसकी सरकार बनेगी। भाजपा का दावा है कि इस चुनाव में उसे 300 सीटें मिलने जा रही हैं लेकिन राफेल डील विवाद, बढ़ती बेरोजगारी, नोटबंदी और किसानों की बदहाली जैसे कई बड़े मुद्दे हैं जो भाजपा को लोकसभा में बहुमत के लिए 272 का आंकड़ा भी हासिल करने में मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के ‘चौकीदार चोर है’ अभियान ने भी प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता को काफी नुक्सान पहुंचाया है। इसके अलावा विपक्ष की 21 पार्टियों ने प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक विपक्ष की एकजुटता के चलते भाजपा को सीधे-सीधे 100 सीटों का नुक्सान होने की सम्भावना है जो उसे पिछले चुनाव में मिली थीं। भारत के चुनावी इतिहास में दूसरी बार किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ राजनीतिक दलों ने मोर्चा खोला है। इससे पहले 1977 में इंदिरा गांधी के खिलाफ विपक्षी दल एकजुट हुए थे। अगर किन्ही कारणों से भाजपा को लोकसभा में साधारण बहुमत नहीं मिलता है तो भाजपा को सरकार बनाने के लिए जोड़तोड़ करना होगा और इन 4 विकल्पों में किसी एक को चुनना पड़ सकता है।
1. चुनाव के बाद का गठबंधन
एन.डी.ए. में इस समय 29 छोटी-बड़ी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पाॢटयां शामिल हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की 282 सीटों सहित एन.डी.ए. को 336 सीटें मिली थीं। इस बार अगर एन.डी.ए. बहुमत से दूर रहता है तो उसे ओडिशा के बीजू जनता दल (बी.जे.डी.), तेलंगाना की तेलंगाना राष्ट्र समिति (टी.आर.एस.) और आंध्र प्रदेश की वाई.आर.एस. कांग्रेस से समर्थन मिल सकता है। बी.जे.डी. ने पिछले लोकसभा के कार्यकाल में भाजपा को कई मुद्दों पर समर्थन दिया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में आए तूफान ‘फनी’ से निपटने के लिए ओडिशा सरकार की ओर से उठाए गए कदमों की जमकर तारीफ की है जिससे चुनाव के बाद दोनों पार्टियों के बीच गठबंधन की सम्भावना को बल मिला है। तेलंगाना में टी.आर.एस. के अध्यक्ष के. चंद्रशेखर राव और आंध्र प्रदेश में वाई.आर.एस. कांग्रेस के अध्यक्ष जगन मोहन रैड्डी ने भी चुनाव के बाद भाजपा सरकार को समर्थन देने के संकेत दिए हैं।
2. महागठबंधन को तोड़ना
उत्तर प्रदेश की लोकसभा की 80 सीटों के लिए भाजपा के सामने अखिलेश यादव और मायावती का महागठबंधन मोर्चा खोले खड़ा है। 2014 के लोकसभा चुनाव में एन.डी.ए. को उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से 73 सीटें मिली थीं। सपा 5 जबकि बसपा एक सीट भी नहीं जीत पाई थी, लेकिन जो गठबंधन आज हुआ है अगर 2014 में हुआ होता तो देश की तस्वीर कुछ और ही होती। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की प्रचंड जीत के बाद सपा, बसपा, राष्ट्रीय लोक दल और कांग्रेस को महागठबंधन बनाने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसका नतीजा उन्हें 2018 में कैराना, गोरखपुर और फूलपुर के संसदीय उपचुनावों में जीत हासिल करके मिला। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपनी लोकसभा सीट भी नहीं बचा पाए। 2019 के लोकसभा चुनाव में भी महागठबंधन का प्रदर्शन भाजपा से बेहतर होने की सम्भावना है। ऐसे हालात में मोदी-शाह टीम महागठबंधन को तोड़ सकती है। मायावती को डिप्टी पी.एम. पद के साथ-साथ उन पर जो सी.बी.आई., इन्कम टैक्स और ई.डी. के केस चल रहे हैं उनको भी वापस लेने का लालच दिया जा सकता है।
3. प्रधानमंत्री मोदी की होगी छुट्टी!
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस लोकसभा चुनाव में भाजपा को 100 सीटों तक का नुक्सान हो सकता है जो उसने 2014 में ‘मोदी लहर’ में जीती थीं। अगर भाजपा की गिनती 170 पर सिमटती है तो नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को चुनौती मिल सकती है। एन.डी.ए. के कई दलों की पहली पसंद प्रधानमंत्री मोदी नहीं है। रेस में सबसे आगे नितिन गडकरी हैं। कयास लगाए जा रहे हैं कि आर.एस.एस. नितिन गडकरी को नरेंद्र मोदी के विकल्प के तौर पर पेश कर सकती है। अन्य संभावित नामों में केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का नाम प्रमुख है।
4. सहयोगी दलों से होगा अगला पी.एम.
यह ऐसी स्थिति है जिसमें भाजपा को न चाहते हुए भी सामना करना पड़ सकता है। अगर क्षेत्रीय पार्टियां जैसे जनता दल यूनाइटेड (जदयू), टी.आर.एस., ए.आई.डी.एम.के. या बी.जे.डी. अच्छा प्रदर्शन करते हैं और भाजपा की सहयोगी पार्टियों की कुल सीट संख्या भाजपा से ज्यादा होती है तो नीतीश कुमार, नवीन पटनायक या दक्षिण का कोई भी नेता देश का अगला प्रधानमंत्री बन सकता है।

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